
।। जंगलराज या लोकतंत्र? दबंगों की कुल्हाड़ी और पुलिस की खामोशी।।
02 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती।। क्या उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अब कानून का नहीं, बल्कि ‘दबंगों’ का सिक्का चलेगा? नगर थाना क्षेत्र के जोगीपुर से आई खबर सभ्य समाज के माथे पर कलंक की तरह है। यहाँ केवल हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी नहीं चली, बल्कि न्याय व्यवस्था की उम्मीदों पर भी वार किया गया है।
⭐ सत्ता और रसूख का नंगा नाच:—
विशाल यादव का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपनी जमीन पर खड़े आम, नीम और सागौन के पेड़ों को कटने से बचाने की कोशिश की। लेकिन चन्दो गाँव के निवासी दीपक सिंह और निखिल सिंह जैसों के लिए कानून शायद महज एक कागज का टुकड़ा है। उन्होंने न सिर्फ जबरन पेड़ कटवाए, बल्कि विरोध करने पर विशाल के साथ मारपीट भी की।
विडंबना देखिए: पीड़ित विशाल यादव के पिता दीनानाथ यादव कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं। एक तरफ परिवार बीमारी की मार झेल रहा है, दूसरी तरफ दबंगों का यह अमानवीय व्यवहार उनकी पीड़ा को और गहरा कर रहा है।
⭐ पुलिस की कार्यशैली पर खड़े होते सवाल:—
घटना के बाद पीड़ित ने 112 नंबर पर सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुँची भी, लेकिन नतीजा वही—’ढाक के तीन पात’। आरोप है कि नगर पुलिस ने इस मामले में मुकदमा पंजीकृत करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
“जब अपराधी बेखौफ होकर दिनदहाड़े हरे पेड़ काटें और विरोध करने पर खून बहाएं, तो आम आदमी पुलिस के पास नहीं जाएगा तो कहाँ जाएगा? पुलिस की यह सुस्ती कहीं अपराधियों को मौन समर्थन तो नहीं?”
🙈 न्याय की गुहार: अब एसपी से उम्मीद:—
नगर पुलिस की उदासीनता से तंग आकर अंततः विशाल यादव को पुलिस अधीक्षक (SP) और प्रभावी वनाधिकारी के पास न्याय की गुहार लगानी पड़ी है। यह घटना प्रशासन के लिए एक चुनौती है।
👉 क्या पर्यावरण संरक्षण के नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी?
👉 क्या एक बीमार पिता के बेटे को वह न्याय मिलेगा जिसका वह हकदार है?
👉 क्या पुलिस अपनी छवि सुधारते हुए दोषियों को सलाखों के पीछे भेजेगी?
यदि वक्त रहते इन ‘दबंगों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना तय है। पेड़ तो दोबारा उग सकते हैं, लेकिन विश्वास की जो बलि चढ़ रही है, उसकी भरपाई नामुमकिन होगी।








